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D22 – भारत निर्वाचन आयोग

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इतिहास, मुख्य निर्वाचन आयुक्तों का योगदान और आलोचनात्मक समीक्षा

यह लेख भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना, ऐतिहासिक विकास, मुख्य निर्वाचन आयुक्तों के कार्यकाल, चुनावी सुधारों और संस्था की निष्पक्षता एवं जवाबदेही की समीक्षा प्रस्तुत करता है।

1. स्थापना और संवैधानिक आधार

भारत निर्वाचन आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई। संविधान का अनुच्छेद 324 संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी आयोग को देता है। इसी तारीख की स्मृति में प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। आयोग का मुख्यालय नई दिल्ली के निर्वाचन सदन में है।

आयोग के प्रमुख कार्यों में चुनाव कार्यक्रम घोषित करना, मतदान और मतगणना की व्यवस्था, मतदाता सूचियों से संबंधित कार्य, राजनीतिक दलों की मान्यता और चुनाव चिह्नों से जुड़े वैधानिक कार्य तथा आदर्श आचार संहिता के अनुपालन की निगरानी शामिल हैं। पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग कराते हैं।

2. ऐतिहासिक विकास

1951–52 में स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव आयोजित हुआ। लगभग 17.3 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं के लिए मतदाता सूचियां, मतदान केंद्र, चुनाव चिह्न, मतपेटियां और मतदान कर्मचारियों की व्यवस्था करना विशाल प्रशासनिक कार्य था। सुकुमार सेन ने प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में इस चुनाव का नेतृत्व किया।

1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का पहला प्रयोग हुआ। 1988 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में धारा 61A जोड़ी गई। 1998 में कुछ विधानसभा क्षेत्रों में ईवीएम का प्रयोग हुआ और 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी 543 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में इनका इस्तेमाल किया गया।

1989 में दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए गए, लेकिन यह व्यवस्था कुछ समय बाद समाप्त हो गई। 1993 में दो अतिरिक्त आयुक्त फिर नियुक्त हुए। 2013 में वीवीपैट का पहला प्रयोग नागालैंड के नोकसेन उपचुनाव में हुआ; 2019 के लोकसभा चुनाव में सभी मतदान केंद्रों पर इसका इस्तेमाल किया गया।

3. सभी मुख्य निर्वाचन आयुक्त: कार्यकाल और प्रमुख संदर्भ

नीचे आधिकारिक क्रम के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की सूची दी गई है। योगदान के रूप में उनके कार्यकाल में हुए प्रमुख चुनावों या संस्थागत बदलावों का उल्लेख है। किसी घटना का उनके कार्यकाल में होना अपने-आप में यह नहीं दर्शाता कि उसका पूरा श्रेय केवल उसी व्यक्ति को दिया जाए।

सुकुमार सेन (21 मार्च 1950 – 19 दिसंबर 1958) — भारत के प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त। 1951–52 और 1957 के आम चुनावों के संचालन तथा देशव्यापी चुनावी ढांचा खड़ा करने में केंद्रीय भूमिका।

के. वी. के. सुंदरम (20 दिसंबर 1958 – 30 सितंबर 1967) — 1962 और 1967 के आम चुनावों के दौरान चुनावी प्रशासन का नेतृत्व।

एस. पी. सेन वर्मा (1 अक्टूबर 1967 – 30 सितंबर 1972) — 1971 के लोकसभा चुनाव के समय आयोग का नेतृत्व।

डॉ. नागेंद्र सिंह (1 अक्टूबर 1972 – 6 फरवरी 1973) — संक्षिप्त कार्यकाल; आयोग के संवैधानिक और प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन।

टी. स्वामीनाथन (7 फरवरी 1973 – 17 जून 1977) — 1977 के लोकसभा चुनाव के समय मुख्य निर्वाचन आयुक्त।

एस. एल. शकधर (18 जून 1977 – 17 जून 1982) — 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के चुनावी प्रशासन का नेतृत्व।

आर. के. त्रिवेदी (18 जून 1982 – 31 दिसंबर 1985) — ईवीएम के शुरुआती प्रयोग के दौर में आयोग का नेतृत्व।

आर. वी. एस. पेरी शास्त्री (1 जनवरी 1986 – 25 नवंबर 1990) — 1989 में आयोग के तीन-सदस्यीय रूप में अस्थायी बदलाव का दौर।

वी. एस. रमादेवी (26 नवंबर 1990 – 11 दिसंबर 1990) — भारत की पहली महिला मुख्य निर्वाचन आयुक्त; कार्यकाल अत्यंत संक्षिप्त।

टी. एन. शेषन (12 दिसंबर 1990 – 11 दिसंबर 1996) — आदर्श आचार संहिता, चुनावी नियमों के प्रवर्तन और चुनाव खर्च निगरानी पर विशेष जोर; आयोग की सार्वजनिक भूमिका पर व्यापक चर्चा।

एम. एस. गिल (12 दिसंबर 1996 – 13 जून 2001) — ईवीएम के सीमित प्रयोग और चुनावी प्रशासन के विस्तार के दौर में नेतृत्व।

जे. एम. लिंगदोह (14 जून 2001 – 7 फरवरी 2004) — चुनावी निष्पक्षता और नियमों के पालन पर जोर; 2002 गुजरात विधानसभा चुनाव से जुड़ी आयोग की भूमिका चर्चा में रही।

टी. एस. कृष्णमूर्ति (8 फरवरी 2004 – 15 मई 2005) — 2004 लोकसभा चुनाव; सभी 543 संसदीय क्षेत्रों में ईवीएम का इस्तेमाल।

बी. बी. टंडन (16 मई 2005 – 29 जून 2006) — चुनावी प्रशासन और ईवीएम आधारित प्रक्रिया का नियमित संचालन।

एन. गोपालस्वामी (30 जून 2006 – 20 अप्रैल 2009) — 2009 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों और प्रशासनिक प्रक्रिया का नेतृत्व।

नवीन बी. चावला (21 अप्रैल 2009 – 29 जुलाई 2010) — 2009 लोकसभा चुनाव का शेष संचालन; मतदाता भागीदारी और जागरूकता के मुद्दे।

डॉ. एस. वाई. कुरैशी (30 जुलाई 2010 – 10 जून 2012) — मतदाता शिक्षा और SVEEP जैसे जागरूकता प्रयासों को बढ़ावा देने का दौर।

वी. एस. संपत (11 जून 2012 – 15 जनवरी 2015) — 2014 लोकसभा चुनाव; मतदाता पंजीकरण और चुनावी सुधारों पर ध्यान।

एच. एस. ब्रह्मा (16 जनवरी 2015 – 18 अप्रैल 2015) — संक्षिप्त कार्यकाल; आयोग के नियमित संवैधानिक कार्य।

डॉ. नसीम जैदी (19 अप्रैल 2015 – 5 जुलाई 2017) — वीवीपैट के विस्तार और 2017 के कई विधानसभा चुनावों के समय नेतृत्व।

ए. के. ज्योति (6 जुलाई 2017 – 22 जनवरी 2018) — गुजरात और हिमाचल प्रदेश सहित विधानसभा चुनावों का संचालन।

ओ. पी. रावत (23 जनवरी 2018 – 1 दिसंबर 2018) — 2018 में कई राज्यों के विधानसभा चुनावों का प्रशासन।

सुनील अरोड़ा (2 दिसंबर 2018 – 12 अप्रैल 2021) — 2019 लोकसभा चुनाव में सभी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट; महामारी के दौरान बिहार चुनाव।

सुशील चंद्रा (13 अप्रैल 2021 – 14 मई 2022) — महामारी के बाद चुनावों का संचालन और 2022 के कई विधानसभा चुनाव।

राजीव कुमार (15 मई 2022 – 18 फरवरी 2025) — 2024 लोकसभा चुनाव तथा विभिन्न राज्य चुनावों के समय आयोग का नेतृत्व।

ज्ञानेश कुमार (19 फरवरी 2025 – वर्तमान) — 19 फरवरी 2025 को पदभार ग्रहण किया; वर्तमान चुनावी प्रशासन और संवैधानिक दायित्वों का नेतृत्व।

4. अन्य निर्वाचन आयुक्त

मुख्य निर्वाचन आयुक्त के अतिरिक्त अन्य निर्वाचन आयुक्त भी आयोग के सामूहिक निर्णयों में भाग लेते हैं। प्रमुख नामों में वी. एस. सेगल और एस. एस. धनोआ (1989–90), डॉ. जी. वी. जी. कृष्णमूर्ति (1993–1999), अशोक लवासा (2018–2020), अनूप चंद्र पांडेय (2021–2024) और अरुण गोयल (2022–2024) शामिल हैं।

5. नियुक्ति, कार्यकाल और स्वतंत्रता

मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। सामान्य कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, होता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने जैसी है; अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता।

6. प्रमुख चुनावी सुधार

ईवीएम ने मतों की रिकॉर्डिंग और गणना की प्रक्रिया में बदलाव किया। वीवीपैट मतदाता को वोट की पर्ची देखने का अवसर देता है, जो बाद में सीलबंद बॉक्स में गिरती है। SVEEP मतदाता शिक्षा और जागरूकता पर केंद्रित है। मतदाता सूची का आधुनिकीकरण, पात्र मतदाताओं का पंजीकरण और आदर्श आचार संहिता का अनुपालन भी आयोग के महत्वपूर्ण कार्य हैं।

7. मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की आलोचनात्मक समीक्षा

संस्थागत नींव: 1950–1980 का दशक

सुकुमार सेन और शुरुआती आयुक्तों का मूल्यांकन उस समय की सीमित तकनीक, विशाल भौगोलिक विस्तार और नवस्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर होना चाहिए। देशव्यापी चुनाव संभव बनाना उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि थी। साथ ही, मतदाता सूचियों और चुनावी प्रशासन को लगातार सुधारने की आवश्यकता बनी रही।

नियमों का प्रवर्तन: 1980–1990 का दशक

इस अवधि में धनबल, बाहुबल, चुनाव खर्च और राजनीतिक प्रभाव को लेकर चिंताएं उभरीं। टी. एन. शेषन के कार्यकाल ने आचार संहिता और चुनावी नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। समीक्षा का मानक यह होना चाहिए कि नियम स्पष्ट हों और सभी दलों पर समान रूप से लागू हों।

तकनीक और भरोसा: 1990 के बाद

ईवीएम और वीवीपैट ने चुनाव संचालन को बदला। लेकिन तकनीक अपनाना ही पारदर्शिता का अंतिम प्रमाण नहीं है। सत्यापन, शिकायत निवारण, प्रक्रियाओं की स्पष्ट जानकारी और सार्वजनिक विश्वास भी आवश्यक हैं।

भागीदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही

मतदाता जागरूकता, सुगम मतदान और डिजिटल सूचना ने महत्व पाया। समीक्षा में यह भी देखना चाहिए कि शिकायतों का निपटारा समय पर हुआ या नहीं, आचार संहिता पर निर्णयों के कारण कितने स्पष्ट थे और मतदाताओं को सुविधाएं कितनी समानता से मिलीं। नियुक्ति प्रक्रिया, निर्णयों की पारदर्शिता और आयोग की स्वतंत्रता पर सार्वजनिक तथा कानूनी विमर्श भी संस्थागत समीक्षा का हिस्सा हैं।

8. समीक्षा के समान मानक

संवैधानिक स्वतंत्रता: क्या आयोग ने अपने अधिकारों का स्वतंत्र और नियमसम्मत उपयोग किया?

आदर्श आचार संहिता: क्या शिकायतों पर समयबद्ध और समान प्रक्रिया अपनाई गई?

पारदर्शिता: क्या निर्णयों के कारण और प्रक्रियाएं स्पष्ट की गईं?

मतदाता अधिकार: क्या पंजीकरण और मतदान की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध थीं?

तकनीक और सत्यापन: क्या तकनीकी प्रक्रिया, सत्यापन और शिकायत निवारण स्पष्ट थे?

जवाबदेही: क्या आयोग ने उठे प्रश्नों का तथ्यात्मक उत्तर दिया?

9. प्रमुख चुनौतियां

आयोग के सामने विशाल स्तर पर चुनाव कराना, चुनावी खर्च की निगरानी, हिंसा और धमकी की रोकथाम, मतदाता सूचियों की शुद्धता, सोशल मीडिया पर गलत सूचना, तकनीकी प्रणालियों पर भरोसा और दिव्यांगजनों तथा दूरदराज के मतदाताओं के लिए सुगम मतदान जैसी चुनौतियां हैं। इनके समाधान में आयोग के साथ राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों, प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिकों की भी भूमिका है।

निष्कर्ष

भारत निर्वाचन आयोग ने 1950 से अब तक देश में नियमित चुनावों के लिए स्थायी संस्थागत ढांचा विकसित किया है। सुकुमार सेन के नेतृत्व में पहले आम चुनाव से लेकर ईवीएम, वीवीपैट और आधुनिक मतदाता सेवाओं तक इसकी भूमिका समय के साथ बदली है। टी. एन. शेषन के दौर ने नियमों के प्रवर्तन पर विशेष सार्वजनिक ध्यान आकर्षित किया, जबकि बाद के दशकों में तकनीक, जागरूकता और प्रशासनिक क्षमता महत्वपूर्ण विषय बने।

किसी भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त की संतुलित समीक्षा में उपलब्धियों के साथ सीमाओं, विवादों और संस्थागत संदर्भों को भी दर्ज करना चाहिए। सबसे उपयोगी प्रश्न यह है कि क्या आयोग के निर्णय कानूनसम्मत, पारदर्शी, समान और जवाबदेह रहे। यह दृष्टिकोण किसी व्यक्ति या दल के पक्ष-विपक्ष में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के लिए है।

संदर्भ

भारत निर्वाचन आयोग: https://www.eci.gov.in/\nपूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की सूची: https://www.eci.gov.in/former-cec-ec\nईवीएम/वीवीपैट संबंधी जानकारी: https://www.eci.gov.in/evm-vvpat

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