D12 – समान कार्य के लिए समान वेतन: महिला सशक्तिकरण की दिशा में भारत की संवैधानिक यात्रा
नई दिल्ली: भारत के संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्र भारत के ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहाँ प्रत्येक नागरिक को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो। इस दृष्टिकोण में महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता को विशेष महत्व दिया गया। आर्थिक और सामाजिक जीवन में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना इसी व्यापक संवैधानिक सोच का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39(घ) के अंतर्गत राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि पुरुषों और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले।
यह सिद्धांत केवल रोजगार और वेतन से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक स्वतंत्रता और महिला सशक्तिकरण से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
समान वेतन की संवैधानिक नींव
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39 राज्य को ऐसी नीतियाँ बनाने की दिशा देता है जिनसे नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
इसके खंड (घ) में यह विचार रखा गया कि पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए।
हालाँकि नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय में सीधे लागू कराने योग्य मौलिक अधिकार नहीं हैं, लेकिन वे शासन और कानून निर्माण के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक मार्गदर्शक सिद्धांत हैं। इसी संवैधानिक उद्देश्य ने आगे चलकर समान पारिश्रमिक से संबंधित कानून बनाने की नींव तैयार की।
1975 में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम
समान वेतन के संवैधानिक उद्देश्य को व्यवहार में लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम 26 सितंबर 1975 को उठाया गया।
इस दिन भारत के राष्ट्रपति ने “समान पारिश्रमिक अध्यादेश, 1975” (Equal Remuneration Ordinance, 1975) जारी किया।
यह कदम अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष 1975 के दौरान उठाया गया था और इसका उद्देश्य महिलाओं तथा पुरुषों के बीच वेतन संबंधी असमानता को कम करने के लिए एक स्पष्ट कानूनी व्यवस्था तैयार करना था।
बाद में इस अध्यादेश को संसद ने कानून का रूप दिया और “समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976” (Equal Remuneration Act, 1976) पारित किया। यह कानून 8 मार्च 1976 से लागू हुआ।
इस प्रकार समान वेतन का संवैधानिक सिद्धांत एक स्पष्ट कानूनी व्यवस्था में बदल गया।
समान कार्य, समान वेतन का सिद्धांत
समान पारिश्रमिक अधिनियम का मूल उद्देश्य स्पष्ट था—यदि कोई पुरुष और महिला समान या समान प्रकृति का कार्य करते हैं, तो केवल उनके लिंग के आधार पर उनके वेतन में अंतर नहीं किया जाना चाहिए।
कानून ने केवल वेतन संबंधी भेदभाव को रोकने तक खुद को सीमित नहीं रखा। इसमें रोजगार से संबंधित कई अन्य क्षेत्रों में भी लैंगिक भेदभाव रोकने का प्रयास किया गया।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:
- भर्ती में लैंगिक भेदभाव पर रोक
- समान या समान प्रकृति के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक
- पदोन्नति से संबंधित भेदभाव को रोकना
- प्रशिक्षण के अवसरों में भेदभाव रोकना
- सेवा की अन्य शर्तों में लैंगिक भेदभाव को सीमित करना
इसका व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी व्यक्ति के रोजगार संबंधी अधिकारों का निर्धारण उसके लिंग के बजाय उसके कार्य और योग्यता के आधार पर हो।
महिलाओं को कम वेतन की समस्या
भारत में लंबे समय से ऐसी शिकायतें सामने आती रही थीं कि समान या समान प्रकृति का काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम भुगतान किया जाता है।
यह समस्या विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक दिखाई देती थी जहाँ बड़ी संख्या में महिलाएँ कम वेतन वाले रोजगार में काम करती थीं।
कृषि, निर्माण, वस्त्र उद्योग और असंगठित क्षेत्र ऐसे क्षेत्र रहे हैं जहाँ महिलाओं के श्रम और पारिश्रमिक से जुड़े सवाल लंबे समय से चर्चा में रहे हैं।
समान पारिश्रमिक अधिनियम ने इस प्रकार की असमानता के खिलाफ एक कानूनी आधार प्रदान किया। इसके तहत नियोक्ताओं पर यह जिम्मेदारी डाली गई कि समान कार्य करने वाली महिला कर्मचारी को केवल महिला होने के कारण पुरुष कर्मचारी से कम पारिश्रमिक न दिया जाए।
रोजगार के अवसरों पर भी जोर
समान पारिश्रमिक कानून का उद्देश्य केवल वेतन में समानता स्थापित करना नहीं था। इसमें महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने की दिशा में भी प्रावधान किए गए।
महिलाओं की भर्ती में भेदभाव रोकने और उनके रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए सलाहकार समितियों के गठन का प्रावधान भी किया गया।
इन समितियों की अवधारणा का उद्देश्य महिलाओं की रोजगार भागीदारी से जुड़े मुद्दों पर विचार करना तथा ऐसी परिस्थितियाँ तैयार करना था जिनमें महिलाओं को रोजगार के क्षेत्र में अधिक समान अवसर मिल सकें।
इस दृष्टि से कानून को केवल “समान वेतन का कानून” मानना इसके व्यापक उद्देश्य को सीमित कर देना होगा। यह महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और रोजगार में समान अवसर की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम था।
समान वेतन और महिला सशक्तिकरण
महिला सशक्तिकरण का संबंध केवल शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी से नहीं है। आर्थिक स्वतंत्रता भी इसका एक महत्वपूर्ण आधार है।
यदि किसी महिला को समान योग्यता और समान कार्य के बावजूद कम पारिश्रमिक मिलता है, तो इसका प्रभाव उसके व्यक्तिगत आर्थिक जीवन के साथ-साथ परिवार और व्यापक समाज पर भी पड़ता है।
समान वेतन का सिद्धांत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह महिलाओं के श्रम के आर्थिक मूल्य को पुरुषों के श्रम के बराबर मान्यता देने की दिशा में काम करता है।
आर्थिक समानता महिलाओं को अपने निर्णय लेने, अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में योगदान देने और रोजगार के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान कर सकती है।
बदलते समय के साथ कानूनों में बदलाव
समय के साथ भारत के श्रम कानूनों में भी बदलाव हुए हैं। समान पारिश्रमिक से जुड़े सिद्धांत को बाद की श्रम व्यवस्था में भी स्थान मिला।
वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019) में भी लिंग के आधार पर वेतन संबंधी भेदभाव से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए हैं।
इससे समान कार्य या समान प्रकृति के कार्य के लिए वेतन में लैंगिक भेदभाव के खिलाफ कानूनी सिद्धांत को आगे बढ़ाया गया।
इस तरह 1970 के दशक में शुरू हुई समान पारिश्रमिक की कानूनी यात्रा बाद की श्रम व्यवस्था में भी जारी रही।
केवल कानून से नहीं, व्यवहार से आएगी समानता
समान वेतन का कानून एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार उपलब्ध कराता है, लेकिन वास्तविक आर्थिक समानता सुनिश्चित करने के लिए कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ सामाजिक और संस्थागत स्तर पर भी बदलाव आवश्यक हैं।
महिलाओं को रोजगार तक समान पहुंच, कौशल विकास, सुरक्षित कार्यस्थल, पदोन्नति के अवसर और निर्णय लेने की भूमिकाओं में समान अवसर मिलना भी महत्वपूर्ण है।
इसी प्रकार, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति भी विशेष ध्यान की मांग करती है, क्योंकि इस क्षेत्र में रोजगार संबंधों की प्रकृति अक्सर औपचारिक क्षेत्र से अलग होती है।
इसलिए समान वेतन का लक्ष्य केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि कानून के प्रभावी पालन और समान अवसरों की वास्तविक उपलब्धता से हासिल किया जा सकता है।
सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 भारतीय श्रम कानूनों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। इसने यह स्पष्ट संदेश दिया कि रोजगार के क्षेत्र में किसी व्यक्ति के साथ उसके लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
यह कानून उस व्यापक संवैधानिक विचार से जुड़ा है जिसमें समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
समान कार्य के लिए समान वेतन केवल आर्थिक अधिकार का प्रश्न नहीं है। यह इस बात से भी जुड़ा है कि समाज महिलाओं के श्रम और योगदान को किस प्रकार महत्व देता है।
निष्कर्ष
भारत के संविधान निर्माताओं ने जिस समानतामूलक समाज की कल्पना की थी, उसमें महिलाओं और पुरुषों को समान अवसर और सम्मान देना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था। अनुच्छेद 39(घ) में व्यक्त समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत इसी सोच का हिस्सा है।
1975 के समान पारिश्रमिक अध्यादेश और उसके बाद 1976 के समान पारिश्रमिक अधिनियम ने इस संवैधानिक उद्देश्य को कानूनी रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद के वर्षों में श्रम कानूनों में हुए बदलावों ने भी इस सिद्धांत को आगे बढ़ाया।
हालाँकि आर्थिक समानता की दिशा में अभी भी अनेक चुनौतियाँ मौजूद हैं, लेकिन समान वेतन का सिद्धांत एक स्पष्ट आधार प्रदान करता है—किसी कर्मचारी का मूल्यांकन उसके लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उसके कार्य, कौशल, योग्यता और योगदान के आधार पर किया जाना चाहिए।
वास्तविक महिला सशक्तिकरण तभी मजबूत होगा जब महिलाओं को न केवल रोजगार के अवसर मिलें, बल्कि उन्हें उनके श्रम के लिए न्यायसंगत और समान पारिश्रमिक भी प्राप्त हो।
समान कार्य के लिए समान वेतन का विचार इसलिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आर्थिक समानता के बिना सामाजिक समानता अधूरी रहती है।