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D17 – गोलियाँ उनके शरीर को भेद सकीं, पर उनके हाथों से तिरंगा नहीं छीन सकीं।

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मातंगिनी हाजरा : तिरंगे को ऊँचा रखकर शहादत देने वाली “गांधी बुरी”

मातृभूमि के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आज़ादी की राह दिखाई। उन्हीं महान विभूतियों में एक थीं मातंगिनी हाजरा, जिन्हें बंगाल में प्रेमपूर्वक “गांधी बुरी” (बूढ़ी गांधी) कहा जाता था। 72 वर्ष की आयु में भी उनके भीतर देशभक्ति की ऐसी ज्योति प्रज्वलित थी कि वे अंग्रेजी शासन के सामने निर्भीक होकर खड़ी रहीं। 29 सितम्बर 1942 को तामलुक (मिदनापुर, वर्तमान पूर्व मिदनापुर, पश्चिम बंगाल) में तिरंगा लेकर आगे बढ़ते हुए वे ब्रिटिश पुलिस की गोलियों का शिकार हुईं, किंतु अंतिम क्षण तक झंडे को झुकने नहीं दिया।

प्रारम्भिक जीवन

मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 को बंगाल के तामलुक क्षेत्र के होगला गाँव में हुआ था। साधारण किसान परिवार में जन्मी मातंगिनी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। कम आयु में उनका विवाह हुआ और शीघ्र ही वे विधवा हो गईं। इसके बावजूद उन्होंने समाजसेवा और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने खादी अपनाई और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेना शुरू किया।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

1930 के दशक में उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह में भाग लिया। कई बार जेल भी गईं। समाज के वंचित वर्गों, महिलाओं तथा महामारी से प्रभावित लोगों की सेवा के कारण वे स्थानीय जनता में अत्यंत लोकप्रिय हो गईं। गांधीवादी जीवनशैली और निस्वार्थ सेवा के कारण लोग उन्हें “गांधी बुरी” कहने लगे।

भारत छोड़ो आंदोलन और शहादत

अगस्त 1942 में महात्मा गांधी ने “भारत छोड़ो आंदोलन” का आह्वान किया। इसके बाद मिदनापुर क्षेत्र में भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक जनांदोलन शुरू हुआ। 29 सितम्बर 1942 को मातंगिनी हाजरा लगभग 6,000 स्वयंसेवकों, जिनमें अधिकांश महिलाएँ थीं, के जुलूस का नेतृत्व करते हुए तामलुक पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ीं। ब्रिटिश प्रशासन ने धारा 144 लगाकर जुलूस को रोकने का प्रयास किया।

जब पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोली चलानी शुरू की, तब मातंगिनी सबसे आगे थीं। उन्हें कई गोलियाँ लगीं, किंतु वे तिरंगा हाथ में लिए आगे बढ़ती रहीं और “वन्दे मातरम्” का उद्घोष करती रहीं। अंततः वे वीरगति को प्राप्त हुईं, परन्तु तिरंगे को झुकने नहीं दिया। उनकी शहादत ने पूरे मिदनापुर में स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की।

विरासत

मातंगिनी हाजरा की शहादत के बाद ताम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार (Tamralipta Jatiya Sarkar) जैसे समानांतर स्वशासन आंदोलनों को प्रेरणा मिली। स्वतंत्र भारत में उनकी स्मृति में अनेक विद्यालय, सड़कें और संस्थान स्थापित किए गए। कोलकाता तथा तामलुक में उनकी प्रतिमाएँ आज भी राष्ट्रभक्ति और साहस की प्रतीक हैं।

प्रेरक संदेश

मातंगिनी हाजरा का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि देशभक्ति आयु की मोहताज नहीं होती। 72 वर्ष की आयु में भी उन्होंने वह साहस दिखाया जिसे इतिहास सदैव याद रखेगा। उनकी शहादत हमें सिखाती है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों की अमूल्य विरासत है।

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